क्या गर्भ के 6 महीने में लिंग की पहचान संभव है? जानें विज्ञान क्या कहता है
गर्भ में लिंग पहचान कैसे होती है?
गर्भावस्था के दौरान भ्रूण का लिंग उसके गुणसूत्रों (Chromosomes) द्वारा निर्धारित होता है। शिशु का लिंग जानने के तरीके आमतौर पर अल्ट्रासाउंड और जेनेटिक टेस्टिंग पर आधारित होते हैं।
शिशु का लिंग कैसे निर्धारित होता है?
- पुरुष (XY) और महिला (XX) गुणसूत्र भ्रूण के लिंग को निर्धारित करते हैं।
- गर्भधारण के शुरुआती हफ्तों में शिशु का लिंग स्पष्ट नहीं होता।
- 12 से 14 सप्ताह (3 से 3.5 महीने) के बीच लिंग विकसित होने लगता है।
- 18 से 20 सप्ताह (4.5 से 5 महीने) में अल्ट्रासाउंड के माध्यम से लिंग की पहचान संभव होती है।
- 6 महीने (24 सप्ताह) में शिशु का लिंग स्पष्ट हो जाता है, लेकिन कानूनी प्रतिबंधों के कारण इसकी पुष्टि नहीं की जा सकती।
क्या 6 महीने में लिंग पता लगाना संभव है?
जी हां, 6 महीने में लिंग पता लगाना पूरी तरह से संभव है। इस समय भ्रूण का विकास अधिक हो चुका होता है, और बेबी जेंडर डिटेक्शन के लिए अल्ट्रासाउंड या कुछ जेनेटिक टेस्टिंग का उपयोग किया जा सकता है।
लिंग पहचान के लिए वैज्ञानिक तरीके
1. अल्ट्रासाउंड (Ultrasound) – 18 से 22 सप्ताह
- सबसे आम तरीका अल्ट्रासाउंड स्कैन होता है।
- 18 से 22 सप्ताह के बीच, यदि शिशु सही स्थिति में हो तो लिंग देखा जा सकता है।
- हालांकि, कुछ मामलों में भ्रूण की स्थिति स्पष्ट नहीं होती, जिससे गलत पहचान हो सकती है।
2. एनआईपीटी टेस्ट (Non-Invasive Prenatal Test – NIPT) – 10 सप्ताह के बाद
- यह एक ब्लड टेस्ट है जो माँ के खून में भ्रूण का DNA देखकर लिंग की पहचान करता है।
- यह टेस्ट 10 सप्ताह के बाद किया जाता है और इसकी सटीकता 99% होती है।
- लेकिन यह टेस्ट मुख्य रूप से जेनेटिक डिसऑर्डर की जांच के लिए किया जाता है।
3. एम्नियोसेंटेसिस (Amniocentesis) – 15 से 20 सप्ताह
- यह टेस्ट गर्भाशय के तरल पदार्थ की जांच करके जेनेटिक असामान्यताओं और लिंग की पहचान करता है।
- हालांकि, यह एक जोखिम भरा तरीका है और केवल चिकित्सा आवश्यकताओं के लिए किया जाता है।
4. सीवीएस टेस्ट (Chorionic Villus Sampling – CVS) – 10 से 13 सप्ताह
- यह टेस्ट प्लेसेंटा की कोशिकाओं की जांच करके लिंग की पहचान करता है।
- यह भी आमतौर पर जेनेटिक बीमारियों की जांच के लिए किया जाता है, न कि लिंग पहचान के लिए।
क्या भारत में गर्भ में लिंग पहचान करना कानूनी है?
भारत में “Pre-Conception and Pre-Natal Diagnostic Techniques Act (PCPNDT Act), 1994” के तहत गर्भ में लिंग पहचान अवैध है। यह कानून भ्रूण हत्या को रोकने के लिए बनाया गया है।
अल्ट्रासाउंड के जरिए लिंग की जांच कराना गैरकानूनी है।
डॉक्टर या डायग्नोस्टिक सेंटर द्वारा लिंग की जानकारी देना प्रतिबंधित है।
ऐसा करने पर सख्त कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
अगर कोई डॉक्टर या क्लिनिक भ्रूण के लिंग की जानकारी देता है, तो उनके खिलाफ 3 से 5 साल तक की जेल और भारी जुर्माने का प्रावधान है।
शिशु का लिंग जानने के तरीके – मिथक और सच्चाई
1. पेट का आकार देखकर लिंग पहचानना – मिथक
सच्चाई: यह धारणा है कि अगर पेट नुकीला है तो लड़का होगा और अगर गोल है तो लड़की होगी। वैज्ञानिक रूप से इसका कोई आधार नहीं है।
2. माँ की खाने की इच्छा – मिथक
सच्चाई: माना जाता है कि अगर माँ मीठा खाने की इच्छा रखती है तो लड़की होगी, और नमकीन खाने का मन हो तो लड़का होगा। लेकिन यह पूरी तरह से एक मिथक है।
3. हृदयगति (Heart Rate) से लिंग पहचानना – मिथक
सच्चाई: कहा जाता है कि यदि भ्रूण की हृदय गति 140 BPM से अधिक हो तो लड़की होगी, और अगर कम हो तो लड़का होगा। वैज्ञानिक तौर पर यह भी असत्य है।
4. त्वचा में बदलाव – मिथक
सच्चाई: कुछ लोग मानते हैं कि अगर माँ की त्वचा निखरी हुई हो तो लड़का होगा, और यदि चेहरे पर मुंहासे आ रहे हों तो लड़की होगी। लेकिन यह हार्मोनल बदलावों के कारण होता है, न कि लिंग से जुड़ा हुआ है।
हां, 6 महीने में लिंग पता लगाना संभव है, लेकिन भारत में यह कानूनी रूप से प्रतिबंधित है।
भारत में लड़कियों की संख्या को संतुलित बनाए रखने और भ्रूण हत्या को रोकने के लिए यह कानून लागू किया गया है।
हां, यह टेस्ट 10 सप्ताह के बाद भ्रूण के डीएनए की जांच कर लिंग की पहचान कर सकता है, लेकिन भारत में यह प्रतिबंधित है।
नहीं, घरेलू उपायों से लिंग का पता लगाना वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं है।
नहीं, शिशु का लिंग पूरी तरह से पिता के गुणसूत्रों द्वारा निर्धारित होता है, न कि माँ की गतिविधियों से।
निष्कर्ष
गर्भ में लिंग पहचान विज्ञान और चिकित्सा के क्षेत्र में पूरी तरह से संभव है, लेकिन भारत में इसे कानूनी रूप से प्रतिबंधित किया गया है। 6 महीने में लिंग पता लगाना वैज्ञानिक रूप से आसान हो सकता है, लेकिन इसे कानूनी रूप से नहीं किया जा सकता। बेबी जेंडर डिटेक्शन को लेकर कई मिथक प्रचलित हैं, लेकिन इनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।
याद रखें: स्वस्थ शिशु ही सबसे महत्वपूर्ण होता है, चाहे वह लड़का हो या लड़की। माता-पिता को लिंग की चिंता करने की बजाय शिशु के संपूर्ण विकास पर ध्यान देना चाहिए।